Singrauli News – देवरा गौशाला की दुर्दशा: गौमाता के नाम पर दिखावा, हकीकत में लापरवाही का बोलबाला

By लाले विश्वकर्मा
सिंगरौली, मध्यप्रदेश: देश में गाय को माता कहे जाने की परंपरा पुरानी है, पर हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आती है। सिंगरौली जिले के देवरा स्थित एनिमल ट्रीटमेंट सेंटर इसका ताजा उदाहरण है, जहां गौवंशों की हालत बदतर बनी हुई है। उद्घाटन के समय तो नेताओं और अधिकारियों ने गौमाता की पूजा कर आस्था का प्रदर्शन किया, लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी कोई उनकी सुध लेने नहीं आया।
“गौशालाएं सोशल मीडिया पर अच्छी, जमीन पर बदहाल”

देवरा में नगर निगम द्वारा पशुपालन विभाग की ज़मीन पर बनाए गए इस एनिमल ट्रीटमेंट सेंटर को मूल रूप से एक्सीडेंटल और बीमार गायों के उपचार के लिए तैयार किया गया था। संचालन की ज़िम्मेदारी एक गौ सेवा संस्थान को दी जानी थी। लेकिन जब संस्था ने बेसिक सुविधाओं की मांग की, जैसे बाउंड्री वॉल और शेड की व्यवस्था — तो नगर निगम ने उचित निर्माण कराने के बजाय चारों ओर केवल तारबंदी कर खानापूर्ति कर दी।
इसके बाद नगर निगम ने इसे खुद ठेके पर चलाना शुरू कर दिया, और तभी से यहां गायों की दशा बद से बदतर होती चली गई-
भूख-प्यास से तड़पती मौतें, लाचार व्यवस्थाएं
स्थानीय टीमों और गौसेवकों द्वारा की गई नियमित जांचों में यह सामने आया है कि यहां न तो पर्याप्त भूसा मिलता है, न ही स्वच्छ पानी और न ही उपचार की सुविधा। कई बार बीमार और घायल गोवंश खुले में पड़े रहते हैं, जिन्हें जंगली जानवर जैसे सियार तक खा जाते हैं।
यह स्थिति तब और दर्दनाक हो जाती है जब यह देखा जाता है कि इन गायों को असुरक्षित और अधूरी व्यवस्था में जबरदस्ती रखा गया है, जबकि यदि इन्हें खुला छोड़ा जाता तो शायद यह स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त होतीं, ना कि संस्थागत उपेक्षा से।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और प्रशासन की उदासीनता
इस पूरे मामले की शिकायत कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से की जा चुकी है। लेकिन दुर्भाग्यवश, ना कोई जांच बैठी और ना ही कोई ठोस कार्यवाही हुई। उद्घाटन के समय मीडिया कवरेज और फोटो खिंचवाने में आगे रहने वाले जनप्रतिनिधि अब पूरी तरह से गायब हैं।
गौमाता के नाम पर सिर्फ प्रतीकवाद?
गौमाता की पूजा और उनके नाम पर राजनैतिक फायदे की होड़ तो दिखती है, लेकिन असल सेवाभाव और ज़मीनी काम कहीं नहीं दिखता। देवरा का यह गौशाला उदाहरण है कि आस्था और आडंबर के बीच कितनी बड़ी खाई बन चुकी है।
सरकार और नगर निगम यदि इस ओर तत्काल ठोस कदम नहीं उठाते, तो यह मामला सिर्फ प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि सामूहिक नैतिक पतन का भी उदाहरण बन जाएगा।















