Singrauli News – गोरबी बना कबाड़ माफियाओं का अड्डा – पुलिस के संरक्षण में फल-फूल रहा अवैध कारोबार, प्रशासन बना मौन दर्शक”
सिंगरौली जिले में अपराध के नए रूप सामने आ रहे हैं, और इन सबके केंद्र में है – गोरबी का कबाड़ बाजार, जो अब एक दुकान भर नहीं रहा, बल्कि एक संगठित साम्राज्य का रूप ले चुका है

By कार्यालय
सिंगरौली जिले में अपराध के नए रूप सामने आ रहे हैं, और इन सबके केंद्र में है – गोरबी का कबाड़ बाजार, जो अब एक दुकान भर नहीं रहा, बल्कि एक संगठित साम्राज्य का रूप ले चुका है। जिला मुख्यालय से महज 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस क्षेत्र में वर्षों से एक बड़ी कबाड़ की दुकान संचालित हो रही है। कई बार इस पर प्रशासनिक कार्रवाई हुई, छापे पड़े, लेकिन परिणाम हर बार “ढाक के तीन पात” जैसा ही रहा।
आखिर क्यों नहीं रुक रहा यह अवैध व्यापार?
चंदे के नाम पर कबाड़ का खेल स्थानीय लोगों और दुकान में काम कर चुके कर्मचारियों के अनुसार, कई पुलिसकर्मी, सरकारी अधिकारी और विभागीय कर्मचारी इस दुकान में नियमित आते हैं, और चंदे के नाम पर पैसा लेते हैं। यही कारण है कि इस दुकान के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती, और जब होती भी है, तो कुछ दिनों की खानापूर्ति कर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।
गोरबी से सिंगरौली तक फैला साम्राज्य
गोरबी की यह दुकान अब केवल एक ठिकाना नहीं, बल्कि पूरे जिले के कबाड़ी कारोबार का मुख्य अड्डा बन चुकी है। इससे जुड़े लोगों ने हर गली, मोहल्ले और चौराहे पर अपने छोटे-छोटे अड्डे बना लिए हैं। दुकानें खोल रखी हैं, और वहीं से चोरी का सामान खरीदकर उसे कबाड़ में तब्दील किया जाता है।
जिले की औद्योगिक कंपनियों, निर्माण स्थलों और आवासीय इलाकों से चोरी किया गया सामान, चाहे वह लोहा, तांबा, मोटर, पाइप या किसी अन्य उपकरण के रूप में हो – सबकुछ इन कबाड़ की दुकानों में बिकता है।
और यह सारा कारोबार प्रशासन की आंखों के सामने होता है।
प्रशासनिक चुप्पी – एक गंभीर प्रश्न
- यह गंभीर सवाल उठता है कि —
- क्या पुलिस को यह सब नहीं दिखता?
- क्या जिला प्रशासन को यह जानकारी नहीं कि गोरबी में अवैध कबाड़ी गतिविधियाँ फल-फूल रही हैं?
- अगर जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं?
- क्या जिले में कानून का राज खत्म हो चुका है और अब अपराधी खुलकर खेल खेल रहे हैं?
ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस और प्रशासन ने इस अवैध व्यापार से ‘सौहार्दपूर्ण दूरी’ बना ली है। उन्हें पता है कि कारोबार गलत है, लेकिन वे मौन हैं — शायद लाभ के चक्कर में या राजनीतिक दबाव में।
एक नंबर की दुकान – दो नंबर का धंधा
यह विडंबना ही है कि कई कबाड़ की दुकानों के पास वैध लाइसेंस भी मौजूद है, लेकिन उन लाइसेंस की आड़ में चोरी का माल धड़ल्ले से खरीदा-बेचा जाता है।
बाहर से देखने पर दुकानें वैध लगती हैं, लेकिन अंदर का खेल पूरी तरह “दो नंबर” का होता है।
सूत्रों की मानें तो गोरबी की मुख्य कबाड़ दुकान दिलीप नामक व्यक्ति द्वारा संचालित की जा रही है, और यही व्यक्ति पूरे जिले में छोटे-बड़े कबाड़ी केंद्रों को संचालित करने वाले लोगों का मुख्य सरगना है।
चोरी और अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा
सिंगरौली में बीते कुछ वर्षों में चोरी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कंपनियों में लगने वाले ट्रांसफॉर्मर, मोटर, वायरिंग, जनरेटर के उपकरण, घरेलू सामान तक चोरी हो रहा है, और इनका सीधा संबंध कबाड़ी कारोबार से है।
जैसे-जैसे कबाड़ की दुकानें बढ़ीं, वैसे-वैसे चोरी और अपराध का ग्राफ भी ऊपर गया।
जनता की उम्मीदें और प्रशासन की ज़िम्मेदारी
- सिंगरौली जिले की आम जनता अब जिला पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर से सीधा सवाल कर रही है:
- कब होगा इस गोरबी साम्राज्य पर ताला?
- कब टूटेगा पुलिस और कबाड़ माफियाओं का गठजोड़?
- कब बचेगा जिले का भविष्य इस अपराध के दलदल से?
अगर अब भी प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं,
तो आने वाले समय में सिंगरौली जैसे जिले में कानून व्यवस्था की कल्पना करना बेमानी होगा। समय की मांग है कि इन कबाड़ माफियाओं के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, उनका लाइसेंस रद्द हो, और पुलिस के उन अधिकारियों की भी जांच हो जो इस काले खेल में शामिल हैं। जनता सिर्फ़ कार्रवाई नहीं, न्याय चाहती है।















